पहलवान मास्टर साहब
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किताब : पहलवान मास्टर साहब
लेखक : नरेन्द्र चौधरी
समर्पित : यशवंतराज जी चौधरी को
हार्डवेयर की दुकान पर मिला एक अनजान आदमी
कुछ दिन पहले की बात है।
मेरा दोस्त सतीश पुणे से आया हुआ था। काफी दिनों बाद आया था। बातों-बातों में उसने कहा - "नरेन्द्र, पंखे वगैरह खरीदने हैं।"
मैंने कहा - "अरे, अपने गाँव की दुकान है, नहर पर हार्डवेयर की दुकान। वहीं से ले लेते हैं।"
हम दोनों वहाँ गए। दुकान पर सामान देख रहे थे। पंखे, तार, पाइप, इसी सब के बारे में बात हो रही थी।
वहीं दुकान पर एक आदमी खड़ा था। मैं उसे जानता नहीं था। वो मेरे लिए एकदम अनजान आदमी था।
दुकान पर हम सब बातचीत कर रहे थे। सामान के बारे में, गाँव के बारे में, इधर-उधर की बातें हो रही थीं।
बातचीत के दौरान ही उस आदमी को पता चला कि मैं यशवंतराज जी चौधरी का लड़का हूँ।
बस, ये सुनते ही वो आदमी एकदम रुक गया। उसने मुझे ध्यान से देखा। उसकी आँखें थोड़ी भर आईं। उसने पूछा - "तुम यशवंतराज जी के लड़के हो?"
मैंने कहा - "हाँ।"
तब उसने कहा - "तो फिर सुनो, तुम्हारे पिताजी ने एक बरसात वाली रात में मेरी जान बचाई थी। अगर वो उस रात नहीं आते, तो मैं आज यहाँ खड़ा नहीं होता।"
मैं एकदम हैरान रह गया। सतीश भी हैरान था।
तब उस आदमी ने मुझे वो पूरी कहानी सुनाई, जो आज तक मुझे भी नहीं पता थी।
उसने बताया - "नरेन्द्र, तुम्हारे पिताजी कैसे हिम्मत वाले आदमी थे। कुश्ती के पहलवान थे, तभी तो एक हाथ से मुझे उठा लिया।"
मेरे पिताजी कौन हैं?
मेरे पिताजी का नाम है - यशवंतराज जी चौधरी।
लोग उन्हें दो नामों से जानते हैं। स्कूल में वो मास्टर साहब हैं, और अखाड़े में वो पहलवान हैं।
पिताजी का बचपन गाँव में ही बीता। गाँव में ही उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की।
गाँव से पढ़ाई पूरी करने के बाद, हाई सेकेंडरी की पढ़ाई के लिए पिताजी पाली आ गए।
पाली में वो अकेले नहीं थे। पाली की सिंधी कॉलोनी में उनके गुरु रहते थे - दलपतराज जी चौधरी। पिताजी उन्हीं के पास जाकर रहने लगे।
गुरु जी ने उन्हें अपने बेटे की तरह रखा। उन्हीं के भरोसे, उन्हीं की छत्रछाया में पिताजी ने अपनी हाई सेकेंडरी की पढ़ाई भी पूरी की, और पहलवानी भी सीखी।
दिन में स्कूल, सुबह-शाम अखाड़ा। सुबह-सुबह उठकर कसरत, दंड-बैठक, अखाड़े में मिट्टी रगड़ना, गुरु जी की सेवा करना, यही उनकी दिनचर्या बन गई।
गुरु जी कहते थे - "पहलवान की असली ताकत उसकी बाहों में नहीं, उसके संस्कार में होती है।"
और पिताजी ने गुरु जी की ये बात पूरी जिंदगी निभाई।
शहर में कहीं भी दंगल हो...
और फिर एक समय ऐसा आया कि पाली शहर में कहीं भी कुश्ती का दंगल होता था, तो मेरे पिताजी वहाँ जरूर पहुँचते थे।
चाहे वो किसी गाँव का दंगल हो, चाहे शहर के किसी मोहल्ले का दंगल हो, चाहे किसी मेले का दंगल हो - पिताजी का नाम सबसे पहले पुकारा जाता था।
लोग कहते थे - "अरे यशवंतराज जी आ गए, अब तो दंगल में मजा आएगा।"
उनकी पकड़ ऐसी थी कि एक बार जिसको पकड़ लिया, वो छूट नहीं पाता था। अखाड़े में जब वो उतरते थे, तो देखने वालों की भीड़ लग जाती थी।
लेकिन पिताजी को कभी घमंड नहीं हुआ। वो कहते थे - "दंगल में जीतना बड़ी बात नहीं है, दंगल में इज्जत कमाना बड़ी बात है।"
आगे चलकर पेशे से वो शिक्षक बने। लांबिया में उनकी ड्यूटी थी। स्कूल में वो बच्चों को पढ़ाते थे, अनुशासन सिखाते थे, और दिल से वो हमेशा अपने गुरु दलपतराज जी के शिष्य रहे।
वो बरसात वाली रात
अब उस आदमी ने मुझे बताया कि उस रात क्या हुआ था।
बरसात के दिन थे। आसमान में बादल गरज रहे थे, बिजलियाँ चमक रही थीं। रात के करीब 10:30 बज रहे थे।
पिताजी लांबिया से ड्यूटी खत्म करके पाली की तरफ आ रहे थे। उनके पास उस समय कवास की गाड़ी थी, चैंपियन। रोड बिल्कुल सुनसान था।
लांबिया से पाली आते समय, बालेलाव और सादावास पड़ते हैं। दोनों गाँव अलग-अलग हैं, लेकिन एक-दूसरे से बिल्कुल अटैच हैं, एक ही जगह लगे हुए हैं।
वहाँ से आगे हेमावास जाने वाली एक छोटी नदी पड़ती है।
उसी नदी के पास, उस आदमी की गाड़ी फिसल गई और सीधे रोड के किनारे काँटों में जा गिरी। उसे बहुत खतरनाक चोट लगी थी। वो उठ नहीं पा रहा था। उसके शरीर से खून बह रहा था। काँटे उसके शरीर में चुभे हुए थे। बारिश में वो पूरा भीग चुका था।
गाड़ियाँ वहाँ से गुजर रही थीं, लेकिन कोई ध्यान नहीं दे रहा था। बारिश और अंधेरे में उसकी आवाज़ किसी तक नहीं जा रही थी। उस वक्त उसे लगा, आज शायद कोई नहीं बचाएगा।
तभी वहाँ से मेरे पिताजी गुजरे।
उन्होंने अपनी चैंपियन गाड़ी रोकी। वो उतरे, उस आदमी के पास गए।
वो आदमी लगभग पिताजी की ही उम्र का था, इसलिए पिताजी ने उसे सम्मान देते हुए कहा - *"घबराओ मत, मैं आ गया हूँ, हिम्मत रखो। कुछ नहीं होगा।"*
फिर पिताजी ने जो किया, वो कोई आम आदमी नहीं कर सकता था। वो उनकी पहलवानी की ताकत थी, जो उन्हें उनके गुरु दलपतराज जी से मिली थी।
उन्होंने एक हाथ से उस आदमी को उठाया। जैसे अखाड़े में वो अपने विरोधी को उठाते थे, वैसे ही उन्होंने उस घायल आदमी को गोदी में उठाया, और अपनी बाइक पर बैठाया। बारिश में, अंधेरे में, खून से लथपथ उस आदमी को संभालकर, पिताजी सीधे उसे पाली बांगड़ हॉस्पिटल लेकर पहुँचे।
अस्पताल में उसे भर्ती कराया, डॉक्टरों को सब बताया, और जब उसे होश आ गया, तब पिताजी वहाँ से चले गए। उन्होंने उसका नाम भी नहीं पूछा। उन्होंने कभी किसी को ये बात बताई भी नहीं कि उन्होंने उस रात किसी की जान बचाई है।
जब उस अनजान आदमी ने हार्डवेयर की दुकान पर मुझे ये पूरी कहानी सुनाई, तो मैं कुछ बोल नहीं पाया।
मेरा दोस्त सतीश भी चुप हो गया। दुकान पर खड़े सब लोग चुप थे।
उस दिन मुझे समझ आया कि मेरे पिताजी सिर्फ एक शिक्षक नहीं हैं।
वो गुरु दलपतराज जी चौधरी के सच्चे शिष्य हैं। गुरु ने उन्हें पढ़ाई भी कराई, पहलवानी भी सिखाई, और इंसानियत भी सिखाई। पिताजी ने उस पहलवानी का इस्तेमाल किसी को हराने के लिए नहीं, किसी की जान बचाने के लिए किया।
वो अखाड़े के पहलवान हैं, और जिंदगी के भी पहलवान हैं। शहर में जहाँ भी दंगल होता था, वहाँ उन्होंने अपनी ताकत दिखाई, लेकिन सबसे बड़ी कुश्ती उन्होंने उस बरसात वाली रात में जीती थी - जब उन्होंने मौत को हराकर एक आदमी की जान बचा ली थी।
ये तो सिर्फ एक कहानी है। ऐसी तो मेरे पिताजी की बहुत सारी कहानियाँ हैं। जो भी उनसे मिला, उसके पास उनकी एक कहानी जरूर है।*
पिताजी, आप जहाँ भी हो, आपका बेटा आज भी आप पर गर्व करता है। आपने मुझे सिखाया कि असली पहलवान वो नहीं जो अखाड़े में जीतता है, असली पहलवान वो है जो मुसीबत में किसी गिरे हुए को उठाता है।
गुरु दलपतराज जी चौधरी को भी नमन, जिन्होंने ऐसे शिष्य को तैयार किया।
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