हर पल का आनंद (जीने का सही तरीका)
वर्तमान में जीने की कला का अर्थ है अपने जीवन को वर्तमान क्षण में पूरी तरह से जीना और उसका आनंद लेना, न कि अतीत में उलझना या भविष्य की चिंता करना। यह कलाMindfulness (माइंडफुलनेस) या सचेतनता के माध्यम से सीखी जा सकती है। वर्तमान में जीना सीखने के लिए, अपने आसपास की बातों पर ध्यान दें, अपनी भावनाओं और शारीरिक संवेदनाओं के प्रति जागरूक रहें, माइंडफुलनेस और ध्यान का अभ्यास करें, एक समय में एक ही काम पर ध्यान दें, और भविष्य की चिंता व अतीत के पछतावे से बचें. आप अपनी शारीरिक गतिविधियों का उपयोग भी वर्तमान में जीने के लिए कर सकते हैं, जैसे टहलते समय अपने आस-पास के वातावरण को महसूस करना या योग करते समय अपने शरीर की मांसपेशियों की गति पर ध्यान देना ।
वर्तमान में जीने का अर्थ है अपने वर्तमान क्षण में सक्रिय रूप से संलग्न रहना। अपने जीवन को सचेतन रूप से जीना और अपनी सांसों के प्रत्येक क्षण पर विश्वास करना एक वरदान है। यह व्यक्ति को जीवन का पूर्ण अनुभव करने में सक्षम बनाता है। यह व्यक्ति को अधिक आनंद, प्रसन्नता और कृतज्ञता का अनुभव कराता है। वर्तमान में रहने से न केवल आपका ध्यान केंद्रित होता है, बल्कि आपकी एकाग्रता, सीखने की क्षमता, सुनने के कौशल और याददाश्त भी बेहतर होती है। यह ध्यान न केवल स्वयं के साथ, बल्कि आपके आस-पास हो रही घटनाओं के साथ भी जुड़ाव पैदा करता है।
जब तक आपके मन में विचार चलेंगे तब तक आप वर्तमान में नहीं रह सकते।
मन की प्रकृति ही है भूत और भविष्य में रहना मन कभी वर्तमान में नहीं रह सकता, भूत और भविष्य हीं मन हैं।
मन एक प्रगाढ़ भ्रम (परसिस्टेंट इल्लुजन) है। जैसे सिनेमा के पर्दे पर स्थिर छवियों को निश्चित गति से चलाया जाए तो वे गतिमान लगती हैं, उस प्रकार है मन। यहाँ विचार इतनी तीव्र गति से चलते हैं कि आपको मन के होने का भ्रम होता है। यही मन आपके स्व को जन्म देता है, जिसे अहम या स्व (सेल्फ)कहते हैं।
यह स्व एक भ्रम है, जिसका मतलब की अब तक तो आपने सारा जीवन भ्रम वश हो कर बिताया।
जब आप आंखे बंद कर अपने मन को देखेंगे तो आपको दो विचारों के बीच एक अंतराल अनुभव होगा। पहले एक क्षण को अनुभव होगा फिर चला जायेगा। फिर कुछ समय के लिए फिर गायब।
धीरे धीरे यह अंतराल बढ़ेगा और आप देखेंगे कि यह अंतराल बढ़ने के साथ साथ विचार और आपका स्व धीरे धीरे खत्म होने लगेगा। एक दिन ऐसा आएगा जब सिर्फ अंतराल बचेगा, निर्विचार निर्दोष शून्यता।
इसी को जेन माइंड या बीगिनर्स माइंड कहते हैं, या नो माइंड भी कहते हैं, या जजेन, या समाधि भी कहते हैं। इसे हीं साक्षी भाव और वर्तमान में रहना भी कहते हैं।
वर्तमान में जीना यानि साक्षी भाव में रहना।आप जो भी कर रहे हो,जैसे भी कर रहे हो,आप पूर्णतया उसके प्रति जागरूक हो।
आप स्वयं को ऐसे देख रहे हो जैसे हम आईने में खुद को देखते हैं।हमारा हर अच्छा बुरा कर्म हमारी नजर में होता है।
ऐसा करते करते हम समय की छननी का प्रयोग करके व्यर्थ को छाँटकर निकाल देते हैं और सार्थक को अपने पास रख लेते हैं।यह स्वयमेव ही सिद्ध होता जाता है।
विवेक का प्रयोग हर पल को खुलकर जीना और नकारात्मकता से दूर रहना सिखाता है।अनावश्यक झगड़ों और बहस से बचाता है।जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण हो तभी वर्तमान में जिया जा सकता है,अन्यथा भूत और भविष्य की चिन्ताएं वर्तमान में रहने ही नहीं देतीं।
वर्तमान में जीने की कला का नाम ही ध्यान है। सबसे आसान तरीका अपनी सांसो को आते जातर देखना है। सांसे हमेशा वर्तमान में ही चलती हैं।दूसरा,प्रकृति के सानिध्य में भी हम आसानी से वर्तमान मे आ जाते हैं।
हर पल पॉजिटिव और हैप्पी माइंड रखने की आदत डालिये और रोज अपना 2.0 बनने की कोशिश करते रहे, फिर आप पाएंगे कि हर चीज बहुत ख़ूबसूरत है।
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