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बुरी आदतों को कैसे छोड़ें?

पाली की एक चाय की दुकान पर एक व्यक्ति रोज़ शाम को चाय पीने बैठता था। चाय के साथ उसे सिगरेट की आदत भी थी। लेकिन उसी दुकान पर दूसरा व्यक्ति हर शाम चाय के साथ मोबाइल निकालता, तीसरा लगातार तंबाकू खाता और चौथा कहता— “बस पाँच मिनट Instagram देख लेता हूँ।” पाँच मिनट कब आधा घंटा बन जाता, पता ही नहीं चलता। इन चारों आदतों का रूप अलग था, लेकिन उनके पीछे एक जैसी प्रक्रिया काम कर रही थी— संकेत आया → इच्छा पैदा हुई → आदत दोहराई गई → थोड़ी देर का reward मिला। यही कारण है कि बुरी आदतें केवल सिगरेट या तंबाकू तक सीमित नहीं हैं। अत्यधिक चाय, मोबाइल, सोशल मीडिया, जंक फूड, बिना जरूरत खरीदारी, गुस्सा, टालमटोल, देर रात तक जागना—इन सबमें आदत का एक समान मनोवैज्ञानिक ढाँचा दिखाई दे सकता है। “आदत की ज़ंजीर दिखाई नहीं देती, मगर इंसान को उसी रास्ते पर बार-बार ले जाती है।” हम बुरी आदतों को छोड़ क्यों नहीं पाते? क्योंकि हम अक्सर केवल उसके नुकसान को जानते हैं, लेकिन उसके तत्काल reward को ज्यादा महसूस करते हैं। चाय के बारे में व्यक्ति जानता है कि बहुत अधिक चाय पीना उसके लिए ठीक नहीं हो सकता, लेकिन सुबह...

जिस व्यवहार से अनुमोदन, सम्मान और प्रशंसा मिल सकती है, वह हमें आकर्षक क्यों लगता है?

पाली की एक छोटी-सी चाय की दुकान पर चार दोस्त बैठे हैं। तीन दोस्त सिगरेट पी रहे हैं। चौथा चुपचाप चाय पी रहा है। कुछ देर बाद एक दोस्त मुस्कुराकर कहता है— “अरे यार, एक सिगरेट तो ले लो… दोस्तों के साथ बैठकर इतना भी नहीं कर सकते?” सिगरेट पीने की इच्छा शायद उस व्यक्ति के भीतर उतनी मजबूत नहीं थी, लेकिन अब उसके सामने एक दूसरी चीज़ आ गई— स्वीकृति। उसे लग सकता है कि सिगरेट लेने से वह दोस्तों के बीच अधिक सहज महसूस करेगा, उसे स्वीकार किया जाएगा और वह समूह का हिस्सा दिखाई देगा। यहीं से मनुष्य के व्यवहार का एक बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक नियम सामने आता है— जिस व्यवहार के साथ हमें अनुमोदन, सम्मान, प्रशंसा या सामाजिक स्वीकृति मिलने की संभावना दिखाई देती है, वह व्यवहार हमें अधिक आकर्षक लगने लगता है। हम हमेशा केवल वस्तु या काम के पीछे नहीं भागते; कई बार हम उसके साथ मिलने वाली सामाजिक प्रतिक्रिया के पीछे भाग रहे होते हैं। “लोगों की वाह-वाह का असर कुछ ऐसा होता है, कि इंसान कभी-कभी अपना रास्ता भी बदल देता है।” प्रशंसा केवल शब्द नहीं है जब कोई हमें कहता है— “बहुत अच्छा किया।” “तुम बहुत समझदार हो।...

पहली और अंतिम स्वतंत्रता — The First and Last Freedom

J. Krishnamurti की पुस्तक से जीवन को देखने की एक यात्रा J. Krishnamurti की The First and Last Freedom का केंद्रीय प्रश्न है— मनुष्य वास्तव में स्वतंत्र कैसे हो? हम बाहरी स्वतंत्रता को स्वतंत्रता समझते हैं। अपनी पसंद के कपड़े पहनना, अपनी नौकरी चुनना, कहीं भी जाना, अपनी बात कहना—ये सब महत्वपूर्ण हैं। लेकिन Krishnamurti प्रश्न को भीतर ले जाते हैं। यदि बाहर से मैं स्वतंत्र हूँ, लेकिन भीतर भय, ईर्ष्या, क्रोध, तुलना, इच्छा, स्मृति और दूसरों की स्वीकृति का गुलाम हूँ, तो क्या मैं वास्तव में स्वतंत्र हूँ? पुस्तक का उत्तर किसी तैयार सिद्धांत में नहीं है। Krishnamurti बार-बार हमें स्वयं देखने के लिए कहते हैं। स्वतंत्रता कहाँ से शुरू होती है? हम सोचते हैं— “पहले मेरी परिस्थितियाँ बदलेंगी, फिर मैं स्वतंत्र होऊँगा।” लेकिन Krishnamurti के लिए स्वतंत्रता की शुरुआत परिस्थिति बदलने से नहीं, मन को समझने से होती है। मन किस चीज़ से बंधा है? किसी व्यक्ति से। किसी विचार से। किसी विश्वास से। किसी डर से। किसी इच्छा से। किसी छवि से। किसी आदर्श से। हम कहते हैं— “मैं ऐसा ही हूँ।” लेकिन यह ...

What Are You Doing With Your Life? आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं?

J. Krishnamurti की पुस्तक पर आधारित एक विस्तृत लेख J. Krishnamurti की पुस्तक का शीर्षक ही हमारे सामने एक ऐसा प्रश्न रखता है जिससे बचना आसान नहीं— “आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं?” यह प्रश्न यह नहीं पूछता कि आपके पास कितना धन है, आपकी नौकरी क्या है या आपने कितनी सफलता प्राप्त की है। यह प्रश्न इससे कहीं भीतर जाता है। आप सोच कैसे रहे हैं? आप प्रेम कैसे करते हैं? आप डर से कैसे जीते हैं? आप संबंधों को कैसे देखते हैं? आप काम क्यों करते हैं? आप शिक्षा को किसलिए चाहते हैं? आप स्वतंत्र हैं या किसी conditioning के अनुसार जी रहे हैं? पुस्तक का आरंभ ही हमें अपने जीवन को किसी तैयार सिद्धांत से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से देखने की ओर ले जाता है। आप अपने जीवन को किसके अनुसार जी रहे हैं? बचपन से हमें बताया जाता है कि हमें क्या बनना चाहिए। माता-पिता कुछ चाहते हैं। समाज कुछ चाहता है। शिक्षा व्यवस्था कुछ चाहती है। बाजार कुछ चाहता है। और धीरे-धीरे हम यह मान लेते हैं कि वही हमारा जीवन है। हम कहते हैं— “मुझे सफल होना है।” लेकिन Krishnamurti पूछते हैं— सफलता किसकी परिभाषा है? ...

Love is not attachment — प्रेम बंधन नहीं है

J. Krishnamurti की दृष्टि से एक पेड़ पर बैठा पक्षी सुंदर इसलिए लगता है क्योंकि वह स्वतंत्र है। यदि कोई उसे पकड़कर सोने के पिंजरे में रख दे, तो पिंजरा कितना भी सुंदर क्यों न हो, उसकी उड़ान समाप्त हो जाती है। हमारे संबंधों में भी कई बार ऐसा ही होता है। हम कहते हैं— “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।” लेकिन उसी प्रेम के साथ धीरे-धीरे अधिकार जुड़ जाता है— “मेरी बात मानो।” “मेरे अनुसार चलो।” “मुझसे दूर मत जाओ।” “तुम किसी और के इतने करीब क्यों हो?” “तुमने मेरी इच्छा के अनुसार काम क्यों नहीं किया?” यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है— क्या यह प्रेम है या खोने का डर? J. Krishnamurti के विचारों में प्रेम को समझने के लिए आसक्ति, भय, ईर्ष्या और अधिकार को समझना आवश्यक है। प्रेम और आसक्ति में अंतर आसक्ति कहती है— “तुम मेरे हो।” प्रेम कहता है— “मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ।” आसक्ति में व्यक्ति दूसरे को अपनी खुशी का स्रोत बना देता है। फिर मन में डर पैदा होता है— “अगर यह व्यक्ति मुझे छोड़ देगा तो?” और जहाँ खोने का डर आता है, वहाँ पकड़ने की इच्छा पैदा होती है। फिर पकड़ने से अधिकार आता है...

Don’t become — Just be“किसी और जैसा बनने की कोशिश मत करो; स्वयं को समझो।”

11. किसी और जैसा मत बनिए — पहले स्वयं को समझिए J. Krishnamurti की दृष्टि में एक बीज को देखकर यदि हम कहें कि इसे पेड़ नहीं, फूल बनना चाहिए, तो समस्या बीज में नहीं है—समस्या हमारी अपेक्षा में है। हर बीज की अपनी प्रकृति होती है। मनुष्य भी अक्सर अपने जीवन के साथ यही करता है। वह कहता है— “मुझे ऐसा बनना है।” “मुझे उससे बेहतर बनना है।” “मुझे हमेशा शांत रहना चाहिए।” “मुझे सफल होना चाहिए।” “मुझे दूसरों जैसा व्यक्तित्व बनाना चाहिए।” धीरे-धीरे वास्तविक व्यक्ति एक तरफ खड़ा हो जाता है और “मुझे क्या बनना चाहिए” की कल्पना दूसरी तरफ। यहीं से भीतर संघर्ष शुरू होता है। J. Krishnamurti के विचारों में स्वयं को समझना किसी आदर्श व्यक्ति में स्वयं को ढालने से अधिक महत्वपूर्ण है। हम हमेशा कुछ बनने की कोशिश क्यों करते हैं? बचपन से हमें बताया जाता है— अच्छे बनो। सफल बनो। सबसे आगे रहो। दूसरों से बेहतर बनो। यह व्यक्ति जैसा बनो। धीरे-धीरे मन ने एक सूत्र सीख लिया— “मैं अभी पर्याप्त नहीं हूँ; मुझे कुछ और बनना है।” फिर पूरी जिंदगी वर्तमान से भविष्य की ओर भागती रहती है। आज जैसा हूँ, वह पर्याप्...

Simplicity — सरलता में ही स्पष्टता है

सरलता — जब मन का अनावश्यक बोझ उतर जाता है कभी-कभी किसी कमरे में बहुत सारी चीज़ें रख दी जाएँ तो जरूरी चीज़ भी दिखाई देना मुश्किल हो जाती है। समस्या यह नहीं कि कमरे में कुछ है; समस्या यह है कि अनावश्यक चीज़ों ने आवश्यक चीज़ों को ढक लिया है। हमारा मन भी कुछ ऐसा ही है। विचारों की भीड़, इच्छाओं की भीड़, लोगों की राय, तुलना, भविष्य की चिंता, अतीत की स्मृतियाँ और स्वयं को साबित करने की लगातार कोशिश—इन सबके बीच जीवन की वास्तविक आवाज़ कहीं दब जाती है। J. Krishnamurti की दृष्टि में सरलता केवल बाहरी जीवन को सादा बनाने का नाम नहीं है; वास्तविक सरलता मन की अनावश्यक जटिलता को समझने से आती है। हम जीवन को जटिल कैसे बनाते हैं? हमारे पास एक इच्छा होती है। वह पूरी होती है। फिर दूसरी इच्छा पैदा होती है। दूसरी पूरी होती है तो तीसरी। धीरे-धीरे हमारा जीवन आवश्यकता से नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती इच्छाओं से संचालित होने लगता है। फिर मन कहता है— “जब यह मिल जाएगा, तब मैं खुश रहूँगा।” लेकिन जब वह मिल जाता है, तो खुशी कुछ समय बाद सामान्य हो जाती है और मन फिर अगले लक्ष्य की ओर दौड़ पड़ता है। इस दौड़ में...