अभ्यास: डर को हराने का सबसे शक्तिशाली तरीका
David Bayles और Ted Orland की प्रसिद्ध पुस्तक Art & Fear में एक बेहद प्रभावशाली उदाहरण मिलता है।
एक मिट्टी के बर्तन बनाने की कक्षा में विद्यार्थियों को दो समूहों में बाँट दिया गया। पहले समूह से कहा गया—“आपको केवल एक बर्तन बनाना है, लेकिन वह बर्तन जितना संभव हो उतना उत्कृष्ट होना चाहिए।”
दूसरे समूह से कहा गया—“आपको गुणवत्ता की चिंता नहीं करनी है। बस जितने अधिक बर्तन बना सकते हैं, बनाते जाइए।”
पहले समूह के विद्यार्थी अपने एक बर्तन को बेहतर से बेहतर बनाने के बारे में सोचते रहे। वे आकार, डिजाइन और पूर्णता पर ध्यान देते रहे।
दूसरे समूह ने बर्तन बनाना शुरू कर दिया।
एक बर्तन बना—खराब हुआ।
दूसरा बनाया—उसमें कमी रह गई।
तीसरा बनाया—कुछ सुधार हुआ।
चौथा बनाया—तकनीक थोड़ी बेहतर हुई।
वे लगातार बनाते रहे।
जब अंत में दोनों समूहों के काम को देखा गया तो आश्चर्यजनक रूप से सबसे अच्छे बर्तन दूसरे समूह के थे—उन लोगों के, जिन्होंने सबसे ज्यादा बर्तन बनाए थे।
यहीं से Art & Fear हमें जिंदगी का एक गहरा सत्य समझाती है—
पूर्णता के बारे में सोचते रहने से पूर्णता नहीं आती; काम करते रहने से आती है।
हममें से बहुत से लोग जिंदगी में इसी पहले समूह की तरह व्यवहार करते हैं।
हम कहते हैं—
“जब पूरी तैयारी हो जाएगी तब शुरू करूंगा।”
“पहले सब कुछ सीख लूं।”
“जब समय मिलेगा तब लिखूंगा।”
“पहले आत्मविश्वास आए, फिर बोलूंगा।”
“पहले पैसे जमा हो जाएँ, फिर व्यवसाय शुरू करूंगा।”
“पहले मेरा काम बिल्कुल अच्छा हो जाए, फिर लोगों को दिखाऊंगा।”
और इसी “पहले तैयार हो जाऊँ, फिर शुरू करूंगा” के चक्कर में शुरुआत ही नहीं होती।
डर हमेशा हमें रोकता नहीं, बहाने बनवाता है
डर का सबसे खतरनाक रूप हमेशा घबराहट नहीं होता।
कई बार डर बहुत समझदार आवाज में आता है।
वह कहता है—
“अभी सही समय नहीं है।”
“थोड़ी और तैयारी कर लो।”
“अभी तुम पर्याप्त अच्छे नहीं हो।”
“दूसरे लोग तुमसे बहुत आगे हैं।”
“अगर असफल हो गए तो?”
यही कारण है कि व्यक्ति को लगता है कि वह काम टाल रहा है, जबकि वास्तव में वह असफलता के डर से बच रहा होता है।
पाली का राजाराम एक किताब लिखना चाहता है। उसने नोटबुक खरीदी, विषयों की सूची बनाई, कई किताबें इकट्ठी कीं और लिखने की योजना भी बना ली।
लेकिन वह पहला पन्ना नहीं लिखता।
क्यों?
क्योंकि उसके मन में एक डर है—
“अगर मैंने लिख दिया और लोगों को पसंद नहीं आया तो?”
उसने अभी तक किताब नहीं लिखी, लेकिन उसके मन ने पहले ही उसकी आलोचना सुन ली।
यही Art & Fear की दुनिया है।
पहला काम अक्सर अच्छा नहीं होता
जब कोई व्यक्ति पहली बार कुछ करता है तो उसका काम पूर्ण नहीं होता।
यह स्वाभाविक है।
पहली कविता शायद कमजोर होगी।
पहला लेख साधारण होगा।
पहली painting में अनुपात गलत होगा।
पहली वीडियो में आवाज अच्छी नहीं होगी।
पहली दुकान की marketing में गलतियाँ होंगी।
पहली presentation में झिझक होगी।
लेकिन इन गलतियों को देखकर रुक जाना सबसे बड़ी गलती है।
क्योंकि अभ्यास का काम केवल आपको काम करवाना नहीं है; अभ्यास आपको काम करना सिखाता है।
पहले प्रयास से आपको अपनी कमी दिखाई देती है।
दूसरे प्रयास में आप उसे सुधारते हैं।
तीसरे में नई कमी दिखाई देती है।
फिर आप उसे सुधारते हैं।
धीरे-धीरे आपका कौशल बढ़ता है।
यानी—
काम → गलती → सीख → सुधार → बेहतर काम।
यही विकास की वास्तविक प्रक्रिया है।
“मैं अच्छा नहीं हूँ” से ज्यादा जरूरी है “मैं कर रहा हूँ”
बहुत लोग अपनी क्षमता का मूल्यांकन शुरुआत में ही करना चाहते हैं।
वे पूछते हैं—
“मैं अच्छा लेखक हूँ या नहीं?”
“मैं अच्छा वक्ता हूँ या नहीं?”
“मैं अच्छा व्यापारी बन सकता हूँ या नहीं?”
लेकिन शायद बेहतर प्रश्न यह है—
“मैं रोज कितना अभ्यास कर रहा हूँ?”
क्योंकि क्षमता कोई पत्थर पर लिखी हुई चीज नहीं है।
अभ्यास से कौशल बदलता है।
आज जो व्यक्ति कमजोर है, वह लगातार अभ्यास से कुछ वर्षों बाद बहुत बेहतर हो सकता है।
और जो व्यक्ति प्रतिभाशाली होते हुए भी अभ्यास छोड़ देता है, उसकी प्रगति वहीं रुक सकती है।
तुलना भी डर का एक रूप है
राजाराम अपना पहला लेख लिखता है और फिर इंटरनेट पर किसी प्रसिद्ध लेखक का लेख पढ़ता है।
वह सोचता है—
“मैं इसके जैसा कभी नहीं लिख सकता।”
यहीं से समस्या शुरू होती है।
उसने अपने पहले कदम की तुलना किसी दूसरे व्यक्ति के वर्षों के अभ्यास से कर दी।
यह तुलना उचित नहीं है।
आपको दूसरे व्यक्ति की अंतिम अवस्था दिखाई देती है।
उसके पीछे छिपे हजारों प्रयास दिखाई नहीं देते।
उसकी असफल रचनाएँ दिखाई नहीं देतीं।
उसके खराब शुरुआती काम दिखाई नहीं देते।
आप केवल उसका परिणाम देखते हैं और अपनी शुरुआत से तुलना करते हैं।
इसलिए तुलना की जगह एक सरल प्रश्न रखिए—
“क्या आज का मेरा काम कल से थोड़ा बेहतर है?”
अगर उत्तर हाँ है, तो आप आगे बढ़ रहे हैं।
पूर्णतावाद कई बार छिपा हुआ डर होता है
“मुझे बिल्कुल perfect करना है।”
यह सुनने में बहुत अच्छी बात लगती है।
लेकिन कई बार perfectionism व्यक्ति को काम करने से ही रोक देता है।
वह सोचता रहता है कि काम इतना अच्छा होना चाहिए कि कोई कमी न निकाल सके।
पर ऐसा काम शायद कभी शुरू ही नहीं होगा।
क्योंकि रचनात्मक काम में सुधार की कोई अंतिम सीमा नहीं होती।
कल जो अच्छा लगा, आज उसमें कमी दिखाई दे सकती है।
इसलिए काम को पूरा करना और फिर अगली बार उसे बेहतर बनाना अक्सर ज्यादा उपयोगी है।
Done is often better than perfect.
काम पूरा कीजिए।
फिर सीखिए।
फिर अगला काम बेहतर कीजिए।
एक पुराना दोहा इसी बात को बहुत सरलता से समझाता है—
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निसान॥
अर्थात लगातार अभ्यास करने से बुद्धि और कौशल विकसित होते हैं। जैसे कुएँ की रस्सी के बार-बार आने-जाने से कठोर पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है।
यही Art & Fear का सार है—
एक कोशिश आपको कलाकार नहीं बनाती; लगातार कोशिशें आपको बेहतर बनाती हैं।
काम ही अगला रास्ता दिखाता है
हम चाहते हैं कि शुरुआत से ही हमें पूरी मंजिल दिखाई दे।
लेकिन जिंदगी हमेशा ऐसा अवसर नहीं देती।
कई बार पहला कदम उठाने के बाद ही दूसरा रास्ता दिखाई देता है।
आप पहला लेख लिखते हैं—तभी आपको पता चलता है कि अगला विषय क्या होना चाहिए।
आप पहला ग्राहक बनाते हैं—तभी आपको पता चलता है कि ग्राहक को वास्तव में क्या चाहिए।
आप पहली वीडियो बनाते हैं—तभी आपको अपनी presentation की कमी दिखाई देती है।
आप पहला व्यवसायिक प्रयास करते हैं—तभी आपको बाजार की वास्तविकता समझ आती है।
इसलिए हमेशा पूरी सीढ़ी देखने की जरूरत नहीं।
कभी-कभी केवल अगली सीढ़ी दिखाई देना पर्याप्त है।
असफलता का अर्थ यह नहीं कि आप असफल हैं
एक खराब बर्तन का अर्थ यह नहीं कि कुम्हार खराब है।
एक खराब लेख का अर्थ यह नहीं कि लेखक खराब है।
एक असफल व्यापारिक प्रयास का अर्थ यह नहीं कि व्यापारी असफल व्यक्ति है।
एक गलती केवल यह बता सकती है कि यह तरीका काम नहीं किया।
यही फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।
अगर व्यक्ति गलती को अपनी पहचान बना लेता है—
“मैं असफल हूँ।”
तो वह रुक जाता है।
लेकिन अगर वह कहता है—
“मेरी यह कोशिश सफल नहीं हुई; अब मैं दूसरा तरीका आजमाऊँगा।”
तो सीखने का रास्ता खुल जाता है।
“ख़ौफ़ की दीवार बड़ी हो तो होने दो,
रास्ता कदमों से निकलता है, इरादों से नहीं।”
डर के बारे में सोचते रहने से डर कम नहीं होता।
कई बार डर के बावजूद काम करने से डर कम होता है।
असल जीत डर का खत्म होना नहीं है
बहुत लोग सोचते हैं—
“जिस दिन मेरा डर खत्म हो जाएगा, उस दिन मैं बड़ा काम करूंगा।”
लेकिन शायद क्रम उल्टा है।
पहले काम आता है।
फिर अनुभव आता है।
फिर क्षमता बढ़ती है।
फिर आत्मविश्वास आता है।
और धीरे-धीरे डर की आवाज कमजोर होने लगती है।
इसलिए अपने मन से यह मत कहिए—
“मुझे डरना नहीं चाहिए।”
इसके बजाय कहिए—
“डर रहा हूँ, फिर भी पहला कदम उठाऊँगा।”
यही Art & Fear का सबसे व्यावहारिक संदेश है।
आखिरी बात
अगर आप कुछ बनाना चाहते हैं तो आपको दो चीजों के साथ समझौता करना पड़ेगा—
अपूर्ण शुरुआत और धीमी प्रगति।
आपका पहला काम शानदार नहीं होगा।
आपकी पहली कोशिश में गलती होगी।
कभी लोग आपकी आलोचना करेंगे।
कभी परिणाम आपकी उम्मीद के अनुसार नहीं आएगा।
लेकिन अगर आप लगातार काम करते रहे तो वही प्रयास आपकी क्षमता बनाते जाएंगे।
डर को खत्म करके काम शुरू करना जरूरी नहीं।
काम शुरू करके डर के पार जाना जरूरी है।
क्योंकि अंत में प्रतिभा से ज्यादा महत्वपूर्ण एक सवाल है—
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