हम दूसरों की आदतों की नकल क्यों करते हैं?


“जैसी संगत बैठिए, तैसो ही फल होय,
संगत अच्छी हो अगर, जीवन सुंदर होय।”

पाली में लाखोटिया उद्यान जाने वाली सड़क पर सुबह का दृश्य देखने लायक होता है। कोई तेज कदमों से पैदल चल रहा है, कोई दौड़ लगा रहा है, कोई योग कर रहा है और कहीं दोस्तों का छोटा-सा समूह मिलकर व्यायाम कर रहा है।

एक दिन एक व्यक्ति ने देखा कि उसके सामने चलने वाला युवक रोज सुबह एक ही समय पर दौड़ने आता है। पहले उसने केवल उसे देखा। फिर एक दिन वह उसके साथ चल पड़ा। कुछ दिनों बाद दौड़ उसकी भी दिनचर्या बन गई।

यह छोटी-सी घटना इंसान के व्यवहार की एक बहुत बड़ी सच्चाई बताती है—हम केवल अपने विचारों से नहीं, बल्कि अपने आसपास के लोगों को देखकर भी अपनी आदतें बनाते हैं।

मनोविज्ञान में सामाजिक सीखने से जुड़ी यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि हम दूसरों के व्यवहार को देखकर उसे सीख सकते हैं। लेकिन सवाल है—किन लोगों का प्रभाव हम पर सबसे अधिक पड़ता है?

मुख्य रूप से तीन सामाजिक समूह हमारी आदतों और व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं—

करीबी समूह, बहुसंख्यक समूह और शक्तिशाली या प्रभावशाली लोग।


1. करीबी समूह — जिनके साथ हम सबसे अधिक समय बिताते हैं

हमारा परिवार, दोस्त, सहकर्मी और वे लोग जिनसे हम रोज मिलते हैं, हमारे करीबी सामाजिक समूह हैं।

इन लोगों का प्रभाव इसलिए अधिक होता है क्योंकि हम उन्हें बार-बार देखते हैं। उनका व्यवहार हमारे लिए परिचित हो जाता है और कई बार हम बिना विशेष प्रयास के उनकी कुछ आदतें अपना लेते हैं।

मान लीजिए पाली में दो मित्र हैं। एक मित्र रोज सुबह लाखोटिया उद्यान में दौड़ने जाता है। दूसरा व्यक्ति व्यायाम नहीं करता। लेकिन जब वह लगातार अपने मित्र को सुबह उठकर दौड़ते देखता है, तो एक दिन वह भी उसके साथ चलने लगता है।

पहले वह केवल मित्र का साथ देता है। फिर उसे अच्छा लगने लगता है। धीरे-धीरे दौड़ना उसकी अपनी आदत बन जाती है।

यही बात बुरी आदतों पर भी लागू हो सकती है।

अगर मित्रों का समूह हर शाम घंटों मोबाइल पर रहता है, तो व्यक्ति के लिए मोबाइल का अत्यधिक उपयोग सामान्य लग सकता है। यदि मित्र रोज पढ़ते हैं, व्यायाम करते हैं और समय पर काम पूरा करते हैं, तो वही व्यवहार भी सामान्य बन सकता है।

इसका विज्ञान क्या कहता है?

मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा के Social Learning Theory के अनुसार मनुष्य दूसरों के व्यवहार को देखकर सीख सकता है।

बंडूरा के प्रसिद्ध Bobo Doll प्रयोगों ने दिखाया कि बच्चे वयस्कों के व्यवहार को देखकर उसका अनुकरण कर सकते हैं।

अर्थात हमारा मस्तिष्क केवल यह नहीं देखता कि दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है; सामाजिक परिस्थितियों में वह उस व्यवहार से सीख भी सकता है।

इसीलिए अच्छी आदत बनाने में वातावरण बहुत महत्वपूर्ण है।

अगर आपको पढ़ने की आदत बनानी है, तो ऐसे लोगों के बीच रहना उपयोगी हो सकता है जो पढ़ते हैं। अगर व्यायाम की आदत बनानी है, तो ऐसे मित्रों के साथ जाना आसान हो सकता है जो नियमित व्यायाम करते हैं।


2. बहुसंख्यक समूह — “जब सब कर रहे हैं तो शायद सही होगा”

अब दूसरी स्थिति देखिए।

आप किसी बाजार में जाते हैं। एक दुकान बिल्कुल खाली है और दूसरी दुकान के सामने लंबी कतार लगी है।

आपके मन में क्या विचार आ सकता है?

“शायद दूसरी दुकान ज्यादा अच्छी है।”

यही है बहुसंख्यक समूह का प्रभाव।

जब हम देखते हैं कि बहुत सारे लोग किसी व्यवहार को अपना रहे हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसे सामान्य या स्वीकार्य मान सकता है।

सोशल मीडिया पर भी इसका उदाहरण दिखाई देता है। किसी वीडियो पर लाखों views देखकर हम उसे ज्यादा महत्वपूर्ण मान सकते हैं। किसी व्यक्ति के बहुत सारे followers देखकर हमें लग सकता है कि उसके विचार जरूर महत्वपूर्ण होंगे।

इसे मनोविज्ञान में Social Proof कहा जाता है।

लेकिन यहां सावधानी जरूरी है—

जो चीज लोकप्रिय है, वह जरूरी नहीं कि सही भी हो।

इसका विज्ञान क्या कहता है?

मनोवैज्ञानिक Solomon Asch ने 1950 के दशक में conformity पर प्रसिद्ध प्रयोग किए। प्रतिभागियों को रेखाओं की लंबाई की तुलना करनी थी। जब समूह के अन्य लोग जानबूझकर गलत उत्तर देते थे, तो कई प्रतिभागियों ने समूह के दबाव में गलत उत्तर से सहमति जताई।

इससे पता चलता है कि समूह का दबाव हमारे निर्णयों को प्रभावित कर सकता है, यहां तक कि तब भी जब व्यक्ति को सही उत्तर मालूम हो।

इसीलिए जीवन में केवल यह मत देखिए कि—

“कितने लोग ऐसा कर रहे हैं?”

यह भी देखिए—

“वे ऐसा क्यों कर रहे हैं?”

भीड़ बड़ी हो सकती है, लेकिन दिशा फिर भी गलत हो सकती है।


बीच में एक दोहा याद रखिए—

“जैसी संगत बैठिए, वैसी बने विचार,
अच्छी संगत दीप है, बुरी करे अंधकार।”

यह केवल काव्य की बात नहीं है। हमारे सामाजिक वातावरण में बार-बार दिखाई देने वाले व्यवहार हमारे लिए सामान्य बन सकते हैं और हमारे निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।


3. शक्तिशाली और प्रभावशाली लोग — जिन्हें हम आदर्श मानते हैं

तीसरा समूह है—सफल, प्रतिष्ठित, शक्तिशाली या प्रभावशाली लोग।

हम उन लोगों की ओर अधिक ध्यान देते हैं जिन्हें हम सफल मानते हैं।

मान लीजिए कोई युवा किसी प्रसिद्ध खिलाड़ी को देखता है। वह खिलाड़ी रोज अभ्यास करता है, अनुशासन में रहता है, अपने खान-पान का ध्यान रखता है और अपने लक्ष्य पर लगातार काम करता है।

युवा केवल उसकी उपलब्धि से प्रभावित नहीं होता। वह उसकी दिनचर्या की नकल करने की कोशिश भी कर सकता है।

इसी तरह किसी सफल व्यापारी को देखकर कोई व्यक्ति समय प्रबंधन, ग्राहक से व्यवहार और काम करने की शैली सीख सकता है।

इसका विज्ञान क्या कहता है?

सामाजिक अधिगम के सिद्धांत के अनुसार मॉडल की विशेषताएँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं। जिस व्यक्ति को हम सफल, प्रतिष्ठित या प्रभावशाली मानते हैं, उसके व्यवहार पर हम अधिक ध्यान दे सकते हैं।

दूसरों की क्रियाओं को देखने और स्वयं क्रिया करने से जुड़े मस्तिष्कीय तंत्र पर भी शोध हुआ है। Mirror-neuron system से संबंधित अध्ययनों ने action observation और action execution के बीच संबंधों को समझने में योगदान दिया है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हम किसी व्यक्ति की हर आदत अपने आप कॉपी कर लेते हैं। असल बात यह है कि दूसरों को देखना हमारे सीखने और व्यवहार को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

इसलिए किसी सफल व्यक्ति की नकल करते समय केवल उसकी बाहरी चीजों को मत देखिए।

उसकी अनुशासन, निरंतरता, मेहनत और सोचने के तरीके को समझिए।


तीनों समूह मिलकर आदत कैसे बनाते हैं?

अब लाखोटिया उद्यान की उसी सुबह को फिर याद कीजिए।

एक व्यक्ति रोज दौड़ता है—आप उसे देखते हैं।

आपका मित्र भी दौड़ने लगा—आप उसके साथ जाने लगते हैं।

फिर आप देखते हैं कि आसपास के बहुत से लोग भी व्यायाम कर रहे हैं—अब यह आपको सामान्य लगने लगता है।

फिर आप किसी सफल खिलाड़ी को भी नियमित व्यायाम करते देखते हैं—आपके मन में उस आदत की अहमियत और बढ़ जाती है।

यानी—

करीबी समूह आपको व्यवहार दिखाता है।
बहुसंख्यक समूह उसे सामान्य बनाता है।
प्रभावशाली व्यक्ति उसे आदर्श बना सकता है।

यहीं से कोई व्यवहार धीरे-धीरे आपकी आदत बन सकता है।

इसलिए यदि आप अपनी आदतें बदलना चाहते हैं, तो केवल इच्छाशक्ति पर निर्भर मत रहिए।

अपना वातावरण भी बदलिए।

ऐसे लोगों के साथ समय बिताइए जिनकी अच्छी आदतें आप अपने जीवन में लाना चाहते हैं।

क्योंकि जिस व्यवहार को आप रोज देखते हैं, वह धीरे-धीरे आपको परिचित लगने लगता है; और जिसे आप सामान्य मानने लगते हैं, उसे अपनाना आसान हो सकता है।


अंत में एक बात

हम अक्सर सोचते हैं—

“मेरी आदतें मेरी अपनी हैं।”

लेकिन हमारी आदतों में परिवार, मित्र, समाज और हमारे आदर्श लोगों की छाप भी हो सकती है।

इसलिए आज एक बार अपने आप से पूछिए—

मैं किन लोगों को रोज देखता हूँ?
मैं किनकी बातें सबसे ज्यादा सुनता हूँ?
और किन लोगों के व्यवहार को मैं अपने लिए आदर्श मानता हूँ?

क्योंकि अपने आसपास के लोगों का चुनाव केवल संगति का चुनाव नहीं है—

यह अपने भविष्य के व्यवहार का चुनाव भी हो सकता है।

और अंत में एक शेर—

“संगत का रंग चढ़ता है, चाहे देर लगे या आज,
जिनके साथ कदम बढ़ाओ, वैसा ही बनता है अंदाज़।”

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