“ख़ुद से मुलाक़ात: नफ़्स, सब्र और ख़ुद पर जीत के उर्दू अशआर”
अपने नफ़्स को क़ाबू में रखना हुनर है,
वरना हर शख़्स को अपनी ख़्वाहिशों का गुमाँ है।
जो अपने दिल की हर इक बात मान लेता है,
वो उम्र भर किसी न किसी चाह में रहता है।
ख़ामोशी से जो अपने आप को सँवारता है,
वही ज़माने में अपना मुक़ाम बनाता है।
हर ख़्वाहिश को पूरा करना ज़िंदगी नहीं,
कुछ ख़्वाहिशों को छोड़ देना भी बंदगी है।
ग़ुस्सा था, मगर लफ़्ज़ों को हमने रोक लिया,
एक पल के सब्र ने रिश्ता बचा लिया।
नफ़्स की राह में हर मोड़ पे फ़ितना देखा,
ख़ुद को जीता तो हर इक ख़ौफ़ को छोटा देखा।
जो अपने वक़्त की क़ीमत समझ गया आख़िर,
वही तो ख़ुद को ज़माने में ख़ास कर बैठा।
चराग़ बन के अँधेरों में जो जला करता है,
वही इंसान अपने रास्ते बना करता है।
ख़ुद पर निगाह रख, दुनिया की ख़बर बाद में कर,
पहले अपने ही दिल का सफ़र बाद में कर।
ख़ुद को समझने में जो उम्र गुज़र जाती है,
वही उम्र फिर ज़िंदगी सँवार जाती है।
अपने ही नफ़्स से हर रोज़ जंग होती है,
जीत जाए जो ख़ुद को, वही फ़तह होती है।
ख़ामोशी से जो अपने आप को सँवारता है,
वही ज़माने में अपना मुक़ाम बनाता है।
हर ख़्वाहिश के पीछे भागना ज़िंदगी नहीं,
कुछ ख़्वाहिशों को रोकना भी बंदगी है।
ग़ुस्सा था, मगर लफ़्ज़ों को हमने रोक लिया,
एक पल के सब्र ने रिश्ता बचा लिया।
ख़ुद पर निगाह रख, दुनिया की ख़बर बाद में कर,
पहले अपने ही दिल का सफ़र बाद में कर।
ख़ुद को तलाश करने निकले तो ये राज़ खुला,
जिसको समझते थे पराया, वो दिल के पास मिला।
हर शोर से दूर होकर ख़ामोशी में बैठ कभी,
शायद तुझे तेरा ही कोई जवाब मिल जाए।
नफ़्स की हर ख़्वाहिश को मंज़िल समझना भूल,
हर रास्ता तेरी मंज़िल तक नहीं जाता।
सब्र रख, हर रात के बाद सवेरा होता है,
वक़्त का क्या है, बदलना उसका फ़ितरत है।
जो अपने ग़ुस्से को एक पल रोक लेता है,
वो कई बरस का रिश्ता टूटने से बचा लेता है।
दुनिया को जीतने की तमन्ना बहुत थी दिल में,
ख़ुद को जीत लिया तो हर जीत छोटी लगी।
आईना रोज़ चेहरा तो दिखाता है मगर,
ख़ुद से मिलने का हुनर हर किसी को नहीं आता।
ख़्वाहिशों की भीड़ में आवाज़ दब जाती है,
दिल को सुकून अक्सर ख़ामोशी में मिलता है।
जो दर्द को समझकर भी मुस्कुरा सके,
वही सब्र की असली ज़बान जानता है।
लफ़्ज़ कम कर दिए तो रिश्ते सँवरने लगे,
हर जवाब देना भी तो ज़रूरी नहीं होता।
वक़्त ने सिखाया कि ठहरना भी हुनर है,
हर दौड़ में शामिल होना कामयाबी नहीं।
अपने किरदार की हिफ़ाज़त करना सीख ले,
लोग चेहरा नहीं, वक़्त आने पर असलियत देखते हैं।
जो आज अपनी ख़्वाहिश को थोड़ा रोक लेता है,
वही कल अपने मुक़द्दर को बदलने की ताक़त रखता है।
ख़ुद से जो रोज़ एक सवाल करता है,
वही धीरे-धीरे अपने जवाब बनाता है।
गिरकर भी जो उठता रहा ख़ामोशी के साथ,
दुनिया ने उसी को एक दिन मज़बूत कहा।
किसी को हराने की आरज़ू नहीं अब दिल में,
बस अपने कल से बेहतर होने की चाह है।
सब्र की राह में कदम धीमे सही, मगर यक़ीन रख,
मंज़िलें शोर से नहीं, निरंतर सफ़र से मिलती हैं।
अपने अंदर के अँधेरे को पहचान पहले,
फिर किसी और के चराग़ का हिसाब करना।
जिस दिन तूने अपने मन को पढ़ना सीख लिया,
उस दिन ज़माने को समझना आसान हो जाएगा।
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