What Are You Doing With Your Life? आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं?


J. Krishnamurti की पुस्तक पर आधारित एक विस्तृत लेख

J. Krishnamurti की पुस्तक का शीर्षक ही हमारे सामने एक ऐसा प्रश्न रखता है जिससे बचना आसान नहीं—

“आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं?”

यह प्रश्न यह नहीं पूछता कि आपके पास कितना धन है, आपकी नौकरी क्या है या आपने कितनी सफलता प्राप्त की है। यह प्रश्न इससे कहीं भीतर जाता है।

आप सोच कैसे रहे हैं?
आप प्रेम कैसे करते हैं?
आप डर से कैसे जीते हैं?
आप संबंधों को कैसे देखते हैं?
आप काम क्यों करते हैं?
आप शिक्षा को किसलिए चाहते हैं?
आप स्वतंत्र हैं या किसी conditioning के अनुसार जी रहे हैं?

पुस्तक का आरंभ ही हमें अपने जीवन को किसी तैयार सिद्धांत से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से देखने की ओर ले जाता है।


आप अपने जीवन को किसके अनुसार जी रहे हैं?

बचपन से हमें बताया जाता है कि हमें क्या बनना चाहिए।

माता-पिता कुछ चाहते हैं।

समाज कुछ चाहता है।

शिक्षा व्यवस्था कुछ चाहती है।

बाजार कुछ चाहता है।

और धीरे-धीरे हम यह मान लेते हैं कि वही हमारा जीवन है।

हम कहते हैं—

“मुझे सफल होना है।”

लेकिन Krishnamurti पूछते हैं—

सफलता किसकी परिभाषा है?

क्या हम वास्तव में वही चाहते हैं, या हमें चाहना सिखाया गया है?

यह प्रश्न पूरी पुस्तक में बार-बार अलग-अलग रूपों में लौटता है।


जीवन और काम

काम हमारे जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा है।

हम काम इसलिए करते हैं क्योंकि हमें पैसा चाहिए।

पैसा सुरक्षा देता है।

सुरक्षा से सुविधा मिलती है।

लेकिन क्या काम केवल सुरक्षा और सुविधा का साधन है?

यदि व्यक्ति जीवन का अधिकांश समय ऐसे काम में लगा दे जिसे वह भीतर से पसंद नहीं करता, केवल इसलिए कि उससे पैसा या प्रतिष्ठा मिलती है, तो Krishnamurti हमें पूछने के लिए प्रेरित करते हैं—

“क्या यह वास्तव में आपका जीवन है?”

वह competition, ambition और career को भी प्रश्न के सामने रखते हैं।

यदि आप किसी दूसरे व्यक्ति से आगे निकलने के लिए काम कर रहे हैं, तो आपकी ऊर्जा किससे आ रही है?

प्रेम से या तुलना से?


प्रतिस्पर्धा और तुलना

हम बचपन से तुलना सीखते हैं।

वह मुझसे आगे है।

वह मुझसे अधिक बुद्धिमान है।

उसके अंक अधिक हैं।

उसके पास अधिक पैसा है।

उसकी नौकरी बेहतर है।

उसका जीवन बेहतर है।

और फिर हम अपने जीवन को किसी दूसरे के जीवन से मापने लगते हैं।

Krishnamurti का प्रश्न है—

क्या तुलना के बिना भी आप स्वयं को जान सकते हैं?

यदि आप लगातार किसी दूसरे से तुलना कर रहे हैं, तो आप अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं देख रहे।

आप केवल यह देख रहे हैं कि आप दूसरे से कितने दूर या कितने आगे हैं।


शिक्षा किसलिए?

शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं होना चाहिए।

यदि शिक्षा हमें केवल तकनीकी दक्षता देती है, लेकिन हमें अपने भय, इच्छा, ईर्ष्या, हिंसा और संबंधों को समझना नहीं सिखाती, तो क्या हमने वास्तव में जीवन की शिक्षा प्राप्त की?

Krishnamurti शिक्षा को मनुष्य की समग्र समझ से जोड़ते हैं।

बच्चे को केवल यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि—

“तुम्हें क्या बनना है।”

बल्कि उसे स्वयं को देखने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।

क्या वह स्वतंत्र रूप से सोच सकता है?

यही प्रश्न शिक्षा को केवल परीक्षा से कहीं बड़ा बना देता है।


विचार और “मैं”

पुस्तक के सबसे गहरे हिस्सों में से एक विचार की प्रकृति पर है।

हम कहते हैं—

“मैं सोच रहा हूँ।”

लेकिन क्या विचार और विचारक वास्तव में अलग हैं?

एक विचार आता है।

दूसरा विचार उसे नियंत्रित करने लगता है।

फिर तीसरा विचार कहता है—

“मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए।”

इस प्रकार मन अपने ही विचारों के साथ संघर्ष करने लगता है।

Krishnamurti हमें विचार को दबाने के बजाय विचार की पूरी गति देखने की ओर ले जाते हैं।

यहीं उनके प्रसिद्ध विचार—

“The observer is the observed.”

की दिशा खुलती है।


भय

भय पुस्तक का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

हम किससे डरते हैं?

असफलता से?

अकेलेपन से?

लोगों की राय से?

नौकरी खोने से?

प्रेम खोने से?

मृत्यु से?

भविष्य से?

Krishnamurti भय को केवल एक भावना मानकर छोड़ नहीं देते। वे हमें देखने के लिए कहते हैं कि भय विचार और समय से कैसे जुड़ा है।

अतीत में कुछ हुआ।

उसकी स्मृति बनी।

अब भविष्य के बारे में विचार आया—

“यह फिर हो सकता है।”

और भय पैदा हो गया।

इसलिए भय को समाप्त करने के लिए केवल उससे भागना पर्याप्त नहीं।

उसे समझना आवश्यक है।


क्रोध और हिंसा

जब हम क्रोधित होते हैं, तो हम अक्सर कहते हैं—

“उसने मुझे क्रोधित कर दिया।”

लेकिन क्या दूसरा व्यक्ति वास्तव में हमारे भीतर क्रोध डाल देता है?

या हमारे भीतर पहले से मौजूद अपेक्षा, स्मृति और प्रतिक्रिया सक्रिय होती है?

Krishnamurti हमें अपने क्रोध को देखने की ओर ले जाते हैं।

उसे सही या गलत ठहराने से पहले।

उसे दबाने से पहले।

उसे justify करने से पहले।

देखिए कि क्रोध वास्तव में कैसे पैदा होता है।

यही observation महत्वपूर्ण है।


ईर्ष्या और इच्छा

हम चाहते हैं कि हमारे पास भी वही हो जो दूसरे के पास है।

दूसरे की सफलता देखकर मन कहता है—

“मुझे भी चाहिए।”

दूसरे की सुंदरता देखकर तुलना।

दूसरे के धन से तुलना।

दूसरे की प्रतिष्ठा से तुलना।

लेकिन यदि हम यह पूछें—

“मेरी इच्छा वास्तव में मेरी है या तुलना से पैदा हुई है?”

तो प्रश्न गहरा हो जाता है।

Krishnamurti desire को समझने के लिए उसके पीछे के image, thought और pleasure को देखने की ओर संकेत करते हैं।


सुख और इच्छा

मन किसी अनुभव को सुखद पाता है।

वह उसे याद रखता है।

फिर मन कहता है—

“मुझे वही अनुभव फिर चाहिए।”

यहीं इच्छा का चक्र शुरू हो सकता है।

अनुभव → स्मृति → इच्छा → पुनः अनुभव की तलाश।

और जब वह अनुभव नहीं मिलता, तो निराशा।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं—

“मुझे क्या चाहिए?”

बल्कि—

“मैं क्यों चाहता हूँ?”


संबंध

हम सोचते हैं कि संबंध दूसरे व्यक्ति के साथ है।

लेकिन Krishnamurti संबंध को हमारे images के माध्यम से देखने के लिए प्रेरित करते हैं।

मैंने आपके बारे में एक छवि बना ली।

आपने मेरे बारे में एक छवि बना ली।

अब हम एक-दूसरे से नहीं, अपनी-अपनी छवियों से संबंध बना रहे हैं।

फिर एक छोटी घटना होती है और हम कहते हैं—

“तुम बदल गए हो।”

संभव है व्यक्ति नहीं बदला।

हमारी उसके बारे में बनी छवि टूट गई।


प्रेम

प्रेम और इच्छा को एक समझ लेना समस्या पैदा कर सकता है।

प्रेम और attachment भी एक नहीं।

जहाँ भय है—

“मुझे मत छोड़ो।”

जहाँ अधिकार है—

“तुम मेरे हो।”

जहाँ ईर्ष्या है—

“तुम किसी और के इतने करीब क्यों हो?”

वहाँ हमें स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या यह प्रेम है या dependency?

Krishnamurti प्रेम को किसी possession की तरह नहीं देखते।

प्रेम में दूसरे को नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।


विवाह और परिवार

विवाह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं; यह दो मनुष्यों का संबंध है।

लेकिन दो लोग अपने साथ अपनी conditioning, expectations, desires और images भी लेकर आते हैं।

इसलिए विवाह केवल साथ रहने का नाम नहीं।

प्रश्न यह है—

क्या दोनों वास्तव में एक-दूसरे को देख रहे हैं?

या अपने-अपने मन की छवियों के अनुसार एक-दूसरे को देख रहे हैं?


अकेलापन

अकेले होने और lonely होने में अंतर है।

हम अकेले होते ही किसी चीज़ से खुद को भरना शुरू कर देते हैं—

बातचीत।

मनोरंजन।

काम।

सोशल गतिविधि।

लेकिन यदि हम कुछ समय अकेले अपने मन के साथ रहें तो क्या होता है?

क्या मन बेचैन होता है?

क्या उसे लगातार कुछ चाहिए?

क्या वह अपने भीतर से भागना चाहता है?

Krishnamurti हमें इस भागने को देखने के लिए प्रेरित करते हैं।


प्रकृति

पुस्तक हमें मनुष्य को प्रकृति से अलग करके देखने की आदत पर भी सोचने को प्रेरित करती है।

हम पेड़ देखते हैं।

पक्षी देखते हैं।

आकाश देखते हैं।

लेकिन क्या हम वास्तव में देखते हैं?

या हमारा मन हमेशा नाम और पहचान में व्यस्त रहता है?

पेड़ को केवल “पेड़” कह देना उसे देखना नहीं है।

जब नाम, विचार और उपयोग की भावना कुछ क्षण पीछे हटती है, तब देखने का अनुभव बदल सकता है।


जीवन और मृत्यु

मृत्यु मनुष्य का सबसे गहरा भय हो सकती है।

हम मृत्यु के बारे में सोचना नहीं चाहते।

लेकिन Krishnamurti मृत्यु को जीवन से अलग घटना की तरह देखने के बजाय पूछते हैं—

क्या हम हर दिन पुरानी चीज़ों को पकड़े हुए नहीं मर रहे हैं?

पुरानी स्मृतियाँ।

पुराने अपमान।

पुरानी छवियाँ।

पुराने भय।

पुरानी पहचान।

यदि हम हर चीज़ को पकड़े रहेंगे, तो नया जीवन कहाँ आएगा?

इसलिए मृत्यु को समझने का प्रश्न केवल अंतिम मृत्यु का प्रश्न नहीं है।

यह प्रश्न है—

क्या मैं अभी जीवित हूँ?


स्वतंत्रता

स्वतंत्रता का अर्थ केवल बाहरी बंधनों से मुक्त होना नहीं।

यदि कोई व्यक्ति समाज के दबाव से मुक्त है लेकिन अपने भय का गुलाम है, तो क्या वह वास्तव में स्वतंत्र है?

यदि वह दूसरों की प्रशंसा के बिना खुश नहीं रह सकता, तो?

यदि वह लगातार तुलना करता है, तो?

यदि वह अपनी छवि की रक्षा करता रहता है, तो?

इसलिए Krishnamurti की स्वतंत्रता की दृष्टि भीतर तक जाती है।

क्या मन स्वयं की conditioning को देख सकता है?


ध्यान

पुस्तक के अंतिम विचारों में ध्यान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ध्यान किसी विशेष मुद्रा तक सीमित नहीं।

ध्यान का संबंध attention से है।

जब आप चलते हैं—क्या आप चलने को देख रहे हैं?

जब आप बोलते हैं—क्या आप अपने शब्दों को देख रहे हैं?

जब क्रोध आता है—क्या आप क्रोध को देख रहे हैं?

जब ईर्ष्या आती है—क्या आप उसे देख रहे हैं?

जब मन भविष्य में भागता है—क्या आप उसे देख रहे हैं?

यह देखने की क्षमता ही ध्यान की दिशा में ले जाती है।

Krishnamurti के लिए ध्यान किसी तकनीक से मन को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि बिना चुनाव के जागरूकता से देखना है।


तो फिर जीवन के साथ क्या करना है?

पुस्तक का सबसे बड़ा संदेश शायद किसी निश्चित उत्तर में नहीं है।

यह हमें स्वयं से प्रश्न करने के लिए छोड़ती है—

मैं क्यों काम कर रहा हूँ?

मैं किससे डरता हूँ?

मैं किससे तुलना करता हूँ?

मैं किसकी स्वीकृति चाहता हूँ?

मेरे संबंध वास्तव में किस पर आधारित हैं?

क्या मैं प्रेम करता हूँ या निर्भर हूँ?

क्या मैं स्वतंत्र हूँ?

क्या मैं स्वयं को जानता हूँ?

क्या मैं वास्तव में जी रहा हूँ?


अंतिम प्रश्न

हम अक्सर जीवन को भविष्य में रखते हैं—

जब नौकरी मिलेगी।

जब पैसा आएगा।

जब घर बनेगा।

जब सम्मान मिलेगा।

जब समस्या खत्म होगी।

तब मैं जीऊँगा।

लेकिन जीवन इंतजार नहीं करता।

जीवन अभी है।

और इसलिए पुस्तक का प्रश्न अंततः हमारे सामने बिल्कुल सीधा खड़ा हो जाता है—

“What Are You Doing With Your Life?”

आप क्या कर रहे हैं अपने जीवन के साथ?

दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी कर रहे हैं?

सफलता की दौड़ में भाग रहे हैं?

भय से बच रहे हैं?

तुलना में जी रहे हैं?

या पहली बार शांत होकर अपने मन को देख रहे हैं?

यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी चुनौती है—

जीवन को बदलने से पहले जीवन को देखिए।
दूसरों को समझने से पहले स्वयं को देखिए।
और कुछ बनने की दौड़ से पहले यह देखिए कि आप अभी वास्तव में कौन हैं।

यहीं से शायद जीवन का प्रश्न पहली बार सचमुच शुरू होता है।

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