अपने-अपने चश्मे
दृश्य 1:
एक सरकारी अस्पताल
अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में हंगामा मचा था। एक गंभीर स्थिति में लाए गए मरीज की हालत नाजुक थी। उसके परिजन बुरी तरह घबराए हुए थे। डॉक्टर को बार-बार फोन किया गया, और आखिरकार वह अस्पताल पहुँचा।
डॉक्टर के आते ही मरीज के रिश्तेदार गुस्से से फट पड़े—
"इतनी देर क्यों लगा दी डॉक्टर साहब? हम कब से आपको बुला रहे थे!"
"अगर कुछ हो जाता तो? क्या आपकी ज़िम्मेदारी नहीं बनती?"
"दूसरे का बेटा है, इसलिए आपको कोई फर्क नहीं पड़ता!"
डॉक्टर ने गहरी साँस ली और शांत स्वर में कहा, "*मुझे अपना काम करने दें। बहस में समय बर्बाद न करें*।"
लेकिन परिजनों की शिकायतें जारी रहीं। डॉक्टर ने बिना कुछ कहे अपने कपड़े बदले, ऑपरेशन थियेटर में गया और दो घंटे के कठिन ऑपरेशन के बाद बाहर आया। उसने असिस्टेंट डॉक्टर को ज़रूरी निर्देश दिए और परिवार को आश्वस्त किया, "मरीज अब खतरे से बाहर है।"
इतना कहकर वह बिना एक पल रुके अस्पताल से बाहर चला गया।
मरीज के रिश्तेदारों का गुस्सा अब भी शांत नहीं हुआ।
"देखा? कैसा अहंकारी डॉक्टर है! दो मिनट रुककर हमसे बात तक नहीं कर सकता!"
"बिलकुल संवेदनहीन आदमी है!"
तभी पास खड़ी एक नर्स से रहा नहीं गया। उसकी आँखों में आँसू छलक आए। वह भारी स्वर में बोली—
"आप जानते हैं डॉक्टर साहब कहाँ गए?"
सभी चुप हो गए।
नर्स ने काँपती आवाज़ में कहा, "उनका जवान बेटा, जो डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था, कल एक सड़क दुर्घटना में मारा गया। घर में सब शोक में डूबे हैं। अंतिम संस्कार की तैयारियाँ चल रही थीं। पर जब आपका फोन आया और केस की गंभीरता समझी, तो वे अपना सबकुछ छोड़कर यहाँ आए।"
इतना कहकर नर्स ने अपनी नम आँखें पोंछीं और चली गई।
हॉल में एक पल के लिए निस्तब्धता छा गई। वे सब, जो अभी तक डॉक्टर के खिलाफ बोले जा रहे थे, अब सिर झुकाए खड़े थे।
दृश्य 2:
एक परिवार में
शादी के कुछ ही महीने हुए थे। बहू अपने पति से पूछ बैठी—
"आपको मुझसे ज़्यादा प्यार है या अपनी माँ से?"
पति ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "मैं तुम दोनों से समान प्रेम करता हूँ।"
पत्नी ने हैरानी से पूछा, "कैसे?"
पति ने बड़े प्यार से समझाया—
"मेरी माँ ने मुझे नौ महीने अपनी कोख में रखा, पाल-पोसकर बड़ा किया। उनका मुझ पर पहला अधिकार बनता है। और तुम, तुमने अपने माता-पिता का घर छोड़कर मेरे लिए नया जीवन अपनाया। तुम्हारा यह त्याग कम बड़ा नहीं। इसलिए मैं तुमसे भी उतना ही प्रेम करता हूँ जितना अपनी माँ से।"
पत्नी चुपचाप उसकी बात सुनती रही। यह जवाब उसके दिल को छू गया।
लेकिन समाज इसे समझेगा? नहीं।
अगर लड़का अपनी पत्नी की जायज़ बात का समर्थन कर दे, तो रिश्तेदार, पड़ोसी और परिवार वाले उसे ताने मारते हैं—
"देखो, दो दिन में जोरू का ग़ुलाम बन गया!"
"अब अपनी माँ की बात सुननी बंद कर दी इसने!"
और अगर वही लड़का अपनी माँ का पक्ष ले, तो पत्नी के मन में कसक उठती है।
यह विडंबना है। हम सिर्फ अपने नज़रिए से देखते हैं, सामने वाले की स्थिति को समझने की कोशिश नहीं करते है
अंतिम संदेश
इस दुनिया में हर कोई अपनी-अपनी दृष्टि से सच को देखता है। कोई यह सोचने की कोशिश नहीं करता कि सामने वाले की सच्चाई क्या हो सकती है।
"किसी भी व्यक्ति को अपने जूते में दूसरे का पैर डालकर, यदि वह उसमें फिट नहीं होता, तो उस दूसरे के पैर को बुरा-भला कहने का कोई अधिकार नहीं है
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