इनाम

इन बीस सालों में ये पचासवाँ घर है जिसे बनाने में उसका खून पसीना लगा है। इस ईमानदारी के खून पसीने से दो वक़्त की रोटी तो कमा पाता है पर अपने लिए एक घर ना बना सका। 

इस बीच जगह बदला उसके मालिक बदलें पर इस मजदूर की किस्मत नहीं। दस बाइ दस के कमरे में इसका परिवार रहता है और इन्हीं चारदीवारी में उनके सपने फड़फड़ाते हैं। बच्चों के सपनें जो उनके उम्र के साथ ही बड़े हो रहे हैं और बीवी के कई सपनों ने आत्महत्या कर ली और कई सपने हैं जो पनपते तो हैं पर तंगहाली उसका गला घोंट देती है। ये हर दिन अपने खून पसीने के साथ अपने सपनों को भी बेचता है ताकि अपने बीवी बच्चों के सपने खरीद सके। पर गरीबों के सपने बिकते बहुत सस्ते हैं। इतने में तो जिंदगी सिर्फ हकीकत दिखाती है। 

आज एक हकीकत इसके सामने आया और अपने मालिक से बगावत कर बैठा "साहब! ई गलत है, अइसन सीमेन्ट अउर सरिया सात मंजिला घर में नाही चली..ऐसा हम नाही होने देंगे" 

"बड़ा आया इंजीनियर की औलाद.. अभी निकाल बाहर करूँगा काम से..चल भाग" 

"साहेब घर में परिवार रहेंगे, बच्चे रहेंगे, कल कोई दुर्घटना हो जाई तो हम अपना के कभी माफ नाही कर सकत हैं"

उसके मालिक ने उसे धक्के दे बाहर कर दिया की तभी "तुम चंद पैसों के लिए घटिया मेटेरियल यूज़ कर रहे हो" 

एक बड़े साहब जिनका कॉन्ट्रैक्ट था उन्होंने सारी बातें सुन ली "हरिया आज से तुम सिर्फ काम ही नहीं करोगे काम देखोगे भी.. कह रहे थे ना ये तुम्हारा पचासवाँ घर है.. अगला घर तुम्हारा होगा तुम्हारा अपना घर.." हरिया के सपने आँखों में आँसू बन सच होते दिख रहे थे 

ईमानदारी सिर्फ दो वक्त की रोटी नहीं..सपने भी खरीद सकती है..!

विनय कुमार मिश्रा

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